(राग धनाश्री)
नैंननिं पर वारौं कोटिक खंजन ।
चंचल चपल अरुन अनियारे, अग्रभाग बन्यौ अंजन ।। [1]
रुचिर मनोहर वक्र विलोकनि, सुरत समर दल गंजन ।
(जै श्री) हित हरिवंश कहत न बनै छबि, सुख समुद्र मन रंजन ।। [2]
- श्री हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (22)
( हे राधे ! तुम्हारे ) नयनों पर मैं कोटि कोटि ख़ंजनों को भी न्यौछावर कर दूँ । ( कितने सुन्दर हैं तुम्हारे नयन ? ) चंचल हैं , अत्यन्त चपल हैं , अरुण है और अनियारे – कोर दार भी । तिस पर उनके अग्र भाग में और अंजन भी लग रहा है । [1]
इन नयनों का रुचिर , मनोहर एवं कटाक्ष पूर्ण बक्र ( तिरछा ) नयन अवलोकन तो सुरत युद्ध में ( विपक्षी ) दल का मथन ही करने वाला है । ” श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं- ” सखी ! इनकी छवि तो कुछ कहते ही नहीं बनती । अरी ! ये तो सुख समुद्र हैं और मन का रंजन करने वाले भी ।” [2]
नैंननिं पर वारौं कोटिक खंजन ।
चंचल चपल अरुन अनियारे, अग्रभाग बन्यौ अंजन ।। [1]
रुचिर मनोहर वक्र विलोकनि, सुरत समर दल गंजन ।
(जै श्री) हित हरिवंश कहत न बनै छबि, सुख समुद्र मन रंजन ।। [2]
- श्री हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (22)
( हे राधे ! तुम्हारे ) नयनों पर मैं कोटि कोटि ख़ंजनों को भी न्यौछावर कर दूँ । ( कितने सुन्दर हैं तुम्हारे नयन ? ) चंचल हैं , अत्यन्त चपल हैं , अरुण है और अनियारे – कोर दार भी । तिस पर उनके अग्र भाग में और अंजन भी लग रहा है । [1]
इन नयनों का रुचिर , मनोहर एवं कटाक्ष पूर्ण बक्र ( तिरछा ) नयन अवलोकन तो सुरत युद्ध में ( विपक्षी ) दल का मथन ही करने वाला है । ” श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं- ” सखी ! इनकी छवि तो कुछ कहते ही नहीं बनती । अरी ! ये तो सुख समुद्र हैं और मन का रंजन करने वाले भी ।” [2]

