(राग मल्हार)
आये माई बरषा के अगवानी।
दादुर मोर पपैया बोले कुँजन बगपाँत उद्वानी ।। [1]
घन की गरज सुन सुधि न रही कछु बदरन देख डरानी ।
कुंभन दास प्रभु गोवर्धनधर लाल भये सुख दानी ।। [2]
- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (346)
हे सखी, अब वर्षा ऋतु का ब्रज में आगमन हुआ है। मेंढक, मोर और सारिकाएँ सभी वन कुंजों में गा रहे हैं और बतखों की कतारें वृक्ष की शाखाओं के ऊपर से उड़ान भर रही हैं। [1]
जब काले बादल गरजते हैं और निकट आते हैं तो उन्हें देख श्री प्यारी जू डर जाती हैं। श्री कुंभनदासजी कहते हैं, "फिर मेरे प्यारे श्री गिरिधर जू श्री प्रिया जू को शीतलता प्रदान कर रहे हैं और इस प्रकार श्री प्रिया जू का आनंद बढ़ रहा है।" [2]
आये माई बरषा के अगवानी।
दादुर मोर पपैया बोले कुँजन बगपाँत उद्वानी ।। [1]
घन की गरज सुन सुधि न रही कछु बदरन देख डरानी ।
कुंभन दास प्रभु गोवर्धनधर लाल भये सुख दानी ।। [2]
- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (346)
हे सखी, अब वर्षा ऋतु का ब्रज में आगमन हुआ है। मेंढक, मोर और सारिकाएँ सभी वन कुंजों में गा रहे हैं और बतखों की कतारें वृक्ष की शाखाओं के ऊपर से उड़ान भर रही हैं। [1]
जब काले बादल गरजते हैं और निकट आते हैं तो उन्हें देख श्री प्यारी जू डर जाती हैं। श्री कुंभनदासजी कहते हैं, "फिर मेरे प्यारे श्री गिरिधर जू श्री प्रिया जू को शीतलता प्रदान कर रहे हैं और इस प्रकार श्री प्रिया जू का आनंद बढ़ रहा है।" [2]

