(सवैया)
मोहनी मोहन सों रसखानि, अचानक भेंट भई बन माँही।
जेठ की घाम भई सुख धाम, आनंद हौं अंग ही अंग समाही॥ [1]
जीवन को फल पायो भटू रस, बातन केलि सों तोरत नाहीं।
कान्ह को हाथ कन्धा पर है मुख, ऊपर मोर किरीट की छाँही॥ [2]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
मोहनी श्री राधा एवं मोहन श्री कृष्ण की अचानक वन में भेंट हो गई। जेठ की धधकती धूप भी सुख प्रदान करने लगी, और दोनों के रोम-रोम में आनंद की तरंगें दौड़ने लगीं। [1]
जैसे जीवन का परम फल साकार हो गया हो, वे केलि-रस में तल्लीन हो उठे। श्री कृष्ण का हाथ श्री राधा के कंधे पर है और श्री राधा के चेहरे पर उनके मोर मुकुट की छाया है। [2]
मोहनी मोहन सों रसखानि, अचानक भेंट भई बन माँही।
जेठ की घाम भई सुख धाम, आनंद हौं अंग ही अंग समाही॥ [1]
जीवन को फल पायो भटू रस, बातन केलि सों तोरत नाहीं।
कान्ह को हाथ कन्धा पर है मुख, ऊपर मोर किरीट की छाँही॥ [2]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
मोहनी श्री राधा एवं मोहन श्री कृष्ण की अचानक वन में भेंट हो गई। जेठ की धधकती धूप भी सुख प्रदान करने लगी, और दोनों के रोम-रोम में आनंद की तरंगें दौड़ने लगीं। [1]
जैसे जीवन का परम फल साकार हो गया हो, वे केलि-रस में तल्लीन हो उठे। श्री कृष्ण का हाथ श्री राधा के कंधे पर है और श्री राधा के चेहरे पर उनके मोर मुकुट की छाया है। [2]

