सुरपति-पसुपति-प्रजापति, रहे भूल तेहि ठौर।
वृंदावन वैभव कहौ, कौन जानिहै और॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (73)
जहाँ का वैभव देखकर स्वयं ब्रह्मा, शिव और इन्द्रादिक भी बौरा (मोहित) जाते हैं, उस श्रीवृन्दावन की महिमा और वहाँ के रस की विभूति भला और कौन जान सकता है?
वृंदावन वैभव कहौ, कौन जानिहै और॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (73)
जहाँ का वैभव देखकर स्वयं ब्रह्मा, शिव और इन्द्रादिक भी बौरा (मोहित) जाते हैं, उस श्रीवृन्दावन की महिमा और वहाँ के रस की विभूति भला और कौन जान सकता है?

