बताओ राधे ! जाऊँ काके द्वार - श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा दैन्य – माधुरी (68)

बताओ राधे ! जाऊँ काके द्वार - श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा दैन्य – माधुरी (68)

बताओ राधे ! जाऊँ काके द्वार ।
साधनहीन दीन अपनावत, ऐसो कौन उदार ।। [1]
नर किन्नर सुर आदि आपुहीं, तपत त्रिताप मझार ।
विधि हरि हर दुर्गादिक जेतिक, सबकी तुम आधार ।। [2]
कहउँ रसिक रस रीति क्षमिय इक, सुने हैं नंदकुमार ।
तिनके कपट जाल सों डरपत, ठगी सबै ब्रजनार ।। [3]
तुम्हरोइ जानि उनहिं सब मानत, गुन अवगुनहिं बिसार ।
काँख जु छोरा लखि ‘कृपालु’ किमि, गाम ढिंढोरा मार ।। [4]

- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा दैन्य – माधुरी (68)

हे मोहन मोहिनी राधे ! तुम ही बताओ, तुम्हें छोड़कर यह दीन भिखारी अब और किसके द्वार पर जाय | तुम्हारे सिवा ऐसा कौन उदार है, जो बिना साधन के ही दीनों को अपना ले । [1]

मनुष्य किन्नर, एवं समस्त देवता लोग तो बेचारे स्वयं ही दैहिक, दैविक, भौतिक तापों में कर्मवश जल रहे हैं | ब्रह्मा, विष्णु, शंकर एवं दुर्गा आदि जितनी भी महान् - से – महान् शक्तियाँ हैं, वे सभी अपने को अपूर्ण समझ कर, एकमात्र तुम्हारे ही चरण कमलों का अवलम्ब लेती हैं । [2]

किशोरी जी ! क्षमा कीजियेगा, रसिकों की विनोदमयी रीति से कुछ कहता हूँ | सुना है कि एक पूर्णतम आनन्दकन्द नन्दनन्दन हैं किन्तु उनके कपटमय एवं निष्ठुर व्यवहार से डर लगता है, जिसकी उदारहण गोपिकाएँ हैं । [3]

उन श्री कृष्ण को जो लोग मानते हैं वे तुम्हारा ही परमप्रिय समझकर उनके गुणों एवं अवगुणों का विचार नहीं करते अर्थात् वे भले ही तुम्हारे समान हों, किन्तु मुझे भय लगता है | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि काँख में दबाये हुए लड़के को देखकर भी सारे गाँव में ढिंढोरा पीटने कौन जाय ? [4]