नित प्रति एकत ही रहत - श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई (9)

नित प्रति एकत ही रहत - श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई (9)

नित प्रति एकत ही रहत, बैस बरन मन एक।
चहियत जुगल किसोर लखि, लोचन जुगल अनेक॥
- श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई (9)

दोनों सदा एक साथ ही रहते हैं। (क्यों न हों?) दोनों की अवस्था, रूप-रंग और मन भी तो एक-से हैं। इस युगलमूर्ति (राधा-कृष्ण) का दर्शन करने के लिए तो आँखों के अनेक जोड़े चाहिए; क्योंकि केवल दो आँखों से देखने पर तृप्ति हो ही नहीं सकती।