गावै हम सोई करै - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (3)

गावै हम सोई करै - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (3)

गावै हम सोई करै, सहज लाडिली लाल ।
करै लाडिली-लाल सो, हम गावै तत्काल ।। [1]
हम गावै तत्काल, सूत दुहुँ दिसि कौ ऐसी ।
बुध जन लेहु बिचारि, कमल दिनकर कौ जैसौ ।। [2]
लीला ललित बिहार, स्याम स्यामा मन भावै ।
भगवतरसिक अननन्य, उपासक अनुदिन गावै ।। [3]

- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (3)

श्री भगवत रसिक जी कहते है हम रसिक जन जैसा कुछ गाते है, श्री श्यामाश्याम अनायास वैसा ही करते है और श्री श्यामा श्याम जैसा करते है हम तत्काल उसी की गाकर सुना देते है । [1] 

विद्वजन इस बात को गहराई से विचार कर समझ लें की हमारा और उन (श्रीयुगल) का सम्बन्ध कुछ ऐसा है जैसा कमल और सूर्य का होता है । (जब कमल खिलते है, तभी सूर्य उदय होता है, या जब सूर्य उदय होता है, तभी कमल खिलते है ।) [2]

ललित बिहार की जो जो लीलाएँ श्रीप्रिया प्रियतम के मन को अच्छी लगती है, रसिक अनन्य उपासक हम लोग प्रतिदिन उन्ही उन्ही लीलाओं का गायन किया करते है । [3]