(राग मालकोस)
जैंवत लाल लाड़िली राजें।
ललितादिक सखी सकल परोसत कनक पात्र मध्य साजें।। [1]
कर मनुहार जिमावत प्यारौ प्यारी जेंवत लाजें।
रसिक प्रीतम तहाँ करत कलेऊ विविध मनोरथ साजें।। [2]
- श्री हरिराय जी
दिव्य दम्पति श्री राधा कृष्ण सवेरे के भोग पाने के लिए विराज रहे हैं । श्री राधा कृष्ण मध्य में विराज रहे हैं, ललिता एवं अन्य सखियाँ कनक [सोने] के पात्र में उन्हें परोस रही हैं । [1]
दोनों एक-दूसरे को खिला रहे हैं। जब श्री कृष्ण राधारानी को खिलाते हैं, उस क्षण राधारानी थोड़ा शर्मा रही हैं । रसिक श्री हरिराय जी कहते हैं कि श्री कृष्ण स्वयं भोग लगाते लगाते श्री प्रिया जी के संग प्रेममयी लीलाओं की योजनाओं का चिंतन कर रहे हैं । [2]
जैंवत लाल लाड़िली राजें।
ललितादिक सखी सकल परोसत कनक पात्र मध्य साजें।। [1]
कर मनुहार जिमावत प्यारौ प्यारी जेंवत लाजें।
रसिक प्रीतम तहाँ करत कलेऊ विविध मनोरथ साजें।। [2]
- श्री हरिराय जी
दिव्य दम्पति श्री राधा कृष्ण सवेरे के भोग पाने के लिए विराज रहे हैं । श्री राधा कृष्ण मध्य में विराज रहे हैं, ललिता एवं अन्य सखियाँ कनक [सोने] के पात्र में उन्हें परोस रही हैं । [1]
दोनों एक-दूसरे को खिला रहे हैं। जब श्री कृष्ण राधारानी को खिलाते हैं, उस क्षण राधारानी थोड़ा शर्मा रही हैं । रसिक श्री हरिराय जी कहते हैं कि श्री कृष्ण स्वयं भोग लगाते लगाते श्री प्रिया जी के संग प्रेममयी लीलाओं की योजनाओं का चिंतन कर रहे हैं । [2]

