अनियारे नैन-सर बेध्यौ - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रिंगार शत 1 (32)

अनियारे नैन-सर बेध्यौ - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रिंगार शत 1 (32)

अनियारे नैन-सर बेध्यौ मन प्रीतम कौ,
विथकित चकित रहत बल-हीने हैं । [1]
काजर की रेख जहाँ रही फबि निसि-रैंन,
तरफि गिरत सखी अंक भरि लीने हैं ।। [2]
रसिक किसोर पिय महा सूर प्रेम रन,
नैननिं ते नैना तौहू न्यारे नहिं कीने हैं । [3]
'हित ध्रुव' प्यारी सुकुमारी रीझि देखै गति,
अति सुकुमार महा प्रेम रंग भीने है ।। [4] 

- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रिंगार शत 1 (32)

श्री लाड़िली के नुकीले नयन-बाणो ने प्रियतम के मन को बींध दिया है, जिससे वे जके-थके से शिथिल एवं शक्ति-रहित हो गये हैं । [1]

प्रिया के नेत्र सहज कजरारे हैं, जिनकी शोभा को देखकर प्रियतम बेसुध होने लगते है, तब सखियाँ उन्हें अंक में भरकर सँभाल लेती है । [2] 

नवल किशोर रसिक प्रियतम प्रेम रूप रणक्षेत्र के विचित्र सूरमा हैं, वे प्रिया के नैन शरों से घायल होकर भी अपने नेत्रों को उनके आगे से हटाते नहीं है । [3]

श्री धुव्रदास जी कहते है कि सुकुमार प्रियतम की महानतम प्रेमरंग भीनी रसस्थिति का अवलोकन करके रिझवार सुकुमारी प्रिया उन पर रीझ जाती है । [4]