तहाँ नहीं कछु श्रम - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (160)

तहाँ नहीं कछु श्रम - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (160)

तहाँ नहीं कछु श्रम तम न ग़म विरह 
भ्रम मान लवलेश प्रवेश न प्रसंगी ।
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (160)

अखंड नित्य विहार रस में न तो कोई श्रम है, न अंधकार है, न कोई ग़म है, न विरह है, न भ्रम है, न मान का ही लवलेश मात्र भी प्रवेश ही न ही कोई इसका प्रसंग ही है ।