(सवैया)
सुनियै सबकी कहिये न कछु, रहियै इमि या भव बागर में। [1]
करियै व्रत नेम सचाई लिये, जिन तें तरियै मन सागर में॥ [2]
मिलियै सब सों दुरभाव बिना, रहिये सतसंग उजागर में। [3]
रसखानि गुबिन्दहि यौं भजियै, जिमि नागरि को चित्त गागर में॥ [4]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
ऊपर-ऊपर से चाहे सबकी सुनो, परंतु मुख से कुछ न कहो। इस रीति से जीने पर तुम सांसारिक राग-द्वेष से बचे रहोगे। [1]
जो भी व्रत धारण करो, उसे निष्ठापूर्वक और सच्चे भाव से निभाओ, यही तुम्हें भव-सागर से पार लगाने का साधन बनेगा। [2]
सबके साथ प्रेमपूर्वक, बिना दुर्भावना मिलो और संत-संग की मधुर छाया में जीवन को आलोकित करो। [3]
श्री रसखान कहते हैं—कृष्ण-भक्ति वैसी होनी चाहिए जैसी गाँव की बाला मटकी सिर पर लिए चलती है; सबसे हँसती-बोलती है, पर मन का ध्यान केवल मटकी पर रहता है। वैसे ही गृहस्थी निभाओ, पर चित्त सदा श्यामसुंदर में ही रमा रहे। [4]
सुनियै सबकी कहिये न कछु, रहियै इमि या भव बागर में। [1]
करियै व्रत नेम सचाई लिये, जिन तें तरियै मन सागर में॥ [2]
मिलियै सब सों दुरभाव बिना, रहिये सतसंग उजागर में। [3]
रसखानि गुबिन्दहि यौं भजियै, जिमि नागरि को चित्त गागर में॥ [4]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
ऊपर-ऊपर से चाहे सबकी सुनो, परंतु मुख से कुछ न कहो। इस रीति से जीने पर तुम सांसारिक राग-द्वेष से बचे रहोगे। [1]
जो भी व्रत धारण करो, उसे निष्ठापूर्वक और सच्चे भाव से निभाओ, यही तुम्हें भव-सागर से पार लगाने का साधन बनेगा। [2]
सबके साथ प्रेमपूर्वक, बिना दुर्भावना मिलो और संत-संग की मधुर छाया में जीवन को आलोकित करो। [3]
श्री रसखान कहते हैं—कृष्ण-भक्ति वैसी होनी चाहिए जैसी गाँव की बाला मटकी सिर पर लिए चलती है; सबसे हँसती-बोलती है, पर मन का ध्यान केवल मटकी पर रहता है। वैसे ही गृहस्थी निभाओ, पर चित्त सदा श्यामसुंदर में ही रमा रहे। [4]

