ना काहू सौं बोलिबौ- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (185.2)

ना काहू सौं बोलिबौ- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (185.2)

ना काहू सौं बोलिबौ, ना कोई व्यौहार।
अपनी कुँवरि कृपालु कौं, जियत निहार-निहार॥
- श्री हित भोरी सखी, प्रेम की पीर (185.2)

न तो मैं किसी से वार्ता करना चाहती हूँ और न ही कोई व्यवहार रखना चाहती हूँ; मैं तो केवल अपनी कुँवरी किशोरी, कृपालु श्री राधिका को ही मन से निहारना चाहती हूँ।