लतनि तजि नैनन भरि चितई।
मुरझि पर्यौ सुधि नाहि देह की द्रग अनि हियरे पैठि गई॥ [1]
अधर कंप राधे मुख उचरत कछु एक हाय कही।
जैश्री वंशी हियौ अति कोमल कंठ लगाय लई ॥ [2]
- श्री वंशी अलि
श्री राधा वन से प्रकट होती हैं और श्री कृष्ण को निहारती हैं (एवं नयन कटाक्ष से श्री कृष्ण के हृदय पर वार करती हैं) जिससे श्री कृष्ण अपनी सुधि खो देते हैं, एवं आनंद से मूर्छा को प्राप्त होते हैं। [1]
कांपती हुई वाणी से श्री कृष्ण "हा राधे!" कहकर श्री राधा का नाम अपने मुख से उच्चारण करते हैं । श्री वंशी अलि कहते हैं, "श्री राधा सरल स्वभाव एवं अति कोमल हृदय वाली हैं, श्री कृष्ण की आह सुनते ही वह उन्हें तुरंत गले से लगा लेती हैं " । [2]
मुरझि पर्यौ सुधि नाहि देह की द्रग अनि हियरे पैठि गई॥ [1]
अधर कंप राधे मुख उचरत कछु एक हाय कही।
जैश्री वंशी हियौ अति कोमल कंठ लगाय लई ॥ [2]
- श्री वंशी अलि
श्री राधा वन से प्रकट होती हैं और श्री कृष्ण को निहारती हैं (एवं नयन कटाक्ष से श्री कृष्ण के हृदय पर वार करती हैं) जिससे श्री कृष्ण अपनी सुधि खो देते हैं, एवं आनंद से मूर्छा को प्राप्त होते हैं। [1]
कांपती हुई वाणी से श्री कृष्ण "हा राधे!" कहकर श्री राधा का नाम अपने मुख से उच्चारण करते हैं । श्री वंशी अलि कहते हैं, "श्री राधा सरल स्वभाव एवं अति कोमल हृदय वाली हैं, श्री कृष्ण की आह सुनते ही वह उन्हें तुरंत गले से लगा लेती हैं " । [2]

