(राग पूर्वी)
यह अभिलाष लडैती मोरी,
यह अभिलाष लडैती मोरी,
तुम लालन संग मुदित विराजौ, मोहिं करौ मुखचंद चकोरी ।। [1]
देहु कृपा करि बेगी छबीली, ललित किशोरी मान निहोरी ।
निस दिन नित्य निकुंज भवन में हाज़िर रहौं वृषभानु किशोरी ।। [2]
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (179)
हे राधारानी, मेरी यही अभिलाषा है की आप लाल जी [श्री कृष्ण] संग मुदित [प्रसन्न चित्त] विराजें और मैं आपको चकोर पक्षी जिस प्रकार चन्द्रमा को निहारता है वैसे ही एकटुक निहारूँ । [1]
हे छबीली [राधिका], अब मेरे अपराधों को क्षमा कर इस दास पर अपनी दया बहुत जल्द ही कर दीजिए । मैं निशि दिन हर क्षण आपकी नित्य लीला में निकुंज भवन में उपस्थित रहूँ, और आपकी नित्य सेवा एवं दर्शन प्राप्त करूँ, ऐसी आकांक्षा है । [2]

