वृन्दावन-तृणगल्माद्यनिशं - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (4.90)

वृन्दावन-तृणगल्माद्यनिशं - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (4.90)

वृन्दावन-तृणगल्माद्यनिशं सच्चिद्रसात्मकं कलयन्।
प्रणमन्नतिभक्तिभराद्य इह वसेतं नमन्त्यहो धन्याः।।

- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (4.90)

जो श्रीवृन्दावन के तृण-गुल्मादि का सच्चिदानन्दघन मूर्त्तिरूप में निशिदिन दर्शन करता है एवं उनको भक्तिपूर्वक निरन्तर प्रणाम करते हुए यहाँ (श्रीवृन्दावन में) वास करता है, उसको भाग्यवान् पुरुष भी नमस्कार करते हैं।