राधे चलि री हरि बोलत - ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (14)

राधे चलि री हरि बोलत - ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (14)

(राग कान्हरौ)
राधे चलि री हरि बोलत कोकिला अलापत
सुर देत पंछी राग बन्यो। [1]
जहाँ मोर काछ बाँधे नृत्य करत
मेघ मृदंग बजावत बंधान गन्यौ॥ [2]
प्रकृति की कोऊ नाहीं यातें सुरति के
उनमान गहि हौं आई मैं जन्यौ। [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी की
अटपटी बानि औरै कहत कछु औरे भन्यौ॥ [4]

- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (14)

श्री हरि [कृष्ण] श्री राधा से बोलते हैं: चलिए कुंज में, जहां कोयल आलाप दे रही है, सुर पंछी गान कर रहे हैं मानो राग में गा रहे हों । [1]

जहां मोर भी पंख फैला फैला कर नाच रहे हैं, एवं मेघ की गरजन भी मृदंग के समान है । [2]

यह और कुछ नहीं, इस बंधे हुए सुर ताल के क्रम में प्यारे को प्यारी की प्रकट मिलाप [मिलन] की चाहत है। श्री कृष्ण श्री राधा के नृत्य देखने की अभिलाषा लिए उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं, बाट जोह रहें हैं, कब राधा जी चलें? [3] 

श्री हरिदास जी की स्वामिनी श्याम से कहा- प्यारे तुम्हारी एक दम अटपटी वाणी है, आपकी चाह कुछ है और कह कुछ रहे हो । [4]