सुरति सुख सोये स्यामाँ स्याम।
गल भुज दिये परस्पर दोऊ, अंग अंग अभिराम।। [1]
तन मन उरझि रहे सुरझत नहिं, जामिनि तीजे जाम ।
भगवत रसिक पलोटत पाँइन सहचरि सब सुख धाम।। [2]
- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (9.5)
अब प्रिया लाल [राधा कृष्ण] रस विलास के सुख में डूब कर सो रहे हैं। वे दोनों परस्पर गलबाँहीं दिये हैं, जिससे उनके अंग अंग की छटा और भी मनोरम हो रही है । [1]
उनके तन मन आपस में ऐसे उलझ रहे हैं कि रात्रि के तीसरे प्रहर में भी नहीं सुलझ पा रहे हैं। भगवतरसिक जी कहते हैं कि प्रिया लाल के लिए इस सर्वोपरि सुख का विधान करने वाली सखियां पास बैठी उनके चरण दबा रही हैं । [2]
गल भुज दिये परस्पर दोऊ, अंग अंग अभिराम।। [1]
तन मन उरझि रहे सुरझत नहिं, जामिनि तीजे जाम ।
भगवत रसिक पलोटत पाँइन सहचरि सब सुख धाम।। [2]
- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (9.5)
अब प्रिया लाल [राधा कृष्ण] रस विलास के सुख में डूब कर सो रहे हैं। वे दोनों परस्पर गलबाँहीं दिये हैं, जिससे उनके अंग अंग की छटा और भी मनोरम हो रही है । [1]
उनके तन मन आपस में ऐसे उलझ रहे हैं कि रात्रि के तीसरे प्रहर में भी नहीं सुलझ पा रहे हैं। भगवतरसिक जी कहते हैं कि प्रिया लाल के लिए इस सर्वोपरि सुख का विधान करने वाली सखियां पास बैठी उनके चरण दबा रही हैं । [2]

