जुगल-प्रेम रस-सार सर, रसिक-हंस अवगाही।
जगत काक-बक बिमुख जे, पलकहुँ पहुँचत नाँहिं॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, नृत्य विलास (47)
रसिक युगल श्री लाड़िली-लाल के सर्वोपरि प्रेम-रस-सार के सरोवर में केवल हंस-स्वरूप रसिक ही अवगाहन करने में समर्थ होते हैं। शेष जगत के विषय-रस-रंजित कौओं और बगुलों के समान जीवन व्यतीत करने वाले भगवत-विमुख अधम जीव एक पल के लिए भी इस रस-सरोवर के समीप नहीं पहुँच पाते।
जगत काक-बक बिमुख जे, पलकहुँ पहुँचत नाँहिं॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, नृत्य विलास (47)
रसिक युगल श्री लाड़िली-लाल के सर्वोपरि प्रेम-रस-सार के सरोवर में केवल हंस-स्वरूप रसिक ही अवगाहन करने में समर्थ होते हैं। शेष जगत के विषय-रस-रंजित कौओं और बगुलों के समान जीवन व्यतीत करने वाले भगवत-विमुख अधम जीव एक पल के लिए भी इस रस-सरोवर के समीप नहीं पहुँच पाते।

