हा कालिन्दि त्वयि मम निधि: प्रेयसा क्षालितोद्भूत्,
भो भो दिव्याद्रभुत्त तरुलतास्त्वत्कर-स्पर्श भाज:।
हे राधाया: रति-गृह-शुका: हे मृगा: हे मयूरा:,
भूयो भूय: प्रणतिभिरहं प्रार्थये वोनुकम्पाम् ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (262)
हे यमुने ! तुम्हारे जल में मेरी निधि -स्वरूपा स्वामिनी को प्रियतम ने स्नान कराया है। उनके (श्रीराधा के) कर स्पर्श को प्राप्त करने वाले, हे अलौकिक और आश्चर्यजनक तरुलताओं (तथा) श्रीराधा के रति गृह में रहने वाले हे मृगो, हे मयूरो, हे शुको मैं बार-बार प्रणाम करके आप सबकी अनुकम्पा चाहता हूँ।
भो भो दिव्याद्रभुत्त तरुलतास्त्वत्कर-स्पर्श भाज:।
हे राधाया: रति-गृह-शुका: हे मृगा: हे मयूरा:,
भूयो भूय: प्रणतिभिरहं प्रार्थये वोनुकम्पाम् ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (262)
हे यमुने ! तुम्हारे जल में मेरी निधि -स्वरूपा स्वामिनी को प्रियतम ने स्नान कराया है। उनके (श्रीराधा के) कर स्पर्श को प्राप्त करने वाले, हे अलौकिक और आश्चर्यजनक तरुलताओं (तथा) श्रीराधा के रति गृह में रहने वाले हे मृगो, हे मयूरो, हे शुको मैं बार-बार प्रणाम करके आप सबकी अनुकम्पा चाहता हूँ।

