आवौ री यह शोभा - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (14)

आवौ री यह शोभा - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (14)

(राग हिंडोरा)
आवौ री यह शोभा निहारें।
नन्दलाल वृषभानुनन्दिनी, झूलि रहे गरबैयां डारें ।। [1]
परत फुहार विपिन हरियाली, वन पक्षी मृदु वचन उचारें। 
अति निरमल जल भरे सरोवर, फूले कमल भ्रमर गुंजारें ।। [2]
पवन झकोर उड़त प्रिय को पट, झट प्रीतम निज हाथ समारें।
 नारायण इनकी या छबि पै, आज सखी हम सरबस वारें ।।[3]
- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (14)

सखी सखी से कहती है कि आओ हम श्री राधा कृष्ण की इस अद्भुत शोभा को निहारें जब वह गलबहियाँ डालें झूला झूल रहे हैं। [1] 

वृंदावन की इन हरि भरी कुंजों में हलकी हलकी बूंदा बांदी से वन के पक्षी भी मृदुल वचन बोल रहे हैं।  वृन्दावन के सरोवर में अति निर्मल जल भरा है, कमल खिले हैं, एवं भ्रमर गुंजार कर रहे हैं । [2]

ऐसे में पवन चलने से श्री प्यारी ज़ू का वस्त्र उड़ता है तो प्रियतम अपने हाथों से उसे सम्भाल लेते हैं । श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि पिय प्यारी की इस समय की इस अद्भुत छवि पर आज हम समस्त सखियाँ अपना सर्वस्व नयौछावर करती हैं । [3]