हमारी सुधि लीजो भानुदुलार ।
हमरे कछु साधन - बल नाहीं, अति जड़ कुटिल लबार ।। [1]
भ्रमत उदर हित नाम ओट नित, ज्यों कूकर सब द्वार ।
समुझत जगत रसिक मोहिं साँचो, तुम उर जाननिहार ।। [2]
सुन्यों कान पतितन अपनावति, शरण गये सुकुमार ।
पुनि कृपालु क्यों भईं निठुर अब, एक ‘कृपालुहिं’ बार ।। [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा दैन्य – माधुरी (96)
हे निकुंजविहारिणी राधे ! हमारी भी खबर लीजिए । हमारे पास किसी प्रकार का कर्म, योग आदि साधन - बल नहीं है । मैं अत्यन्त हठी, दुष्ट एवं बातें बनाने वाला ही हूँ । [1]
पेट पालने के लिए आपके नाम की ओट लेकर दिन - रात कुत्ते की तरह सभी संसारी जीवों के द्वार पर घूमा करता हूँ । भोले - भाले संसार के जीव मुझे सचमुच ही रसिक महापुरुष समझते हैं, किन्तु हे किशोरी जी ! तुम तो हृदय की जानने वाली हो, तुमसे क्या छिपा है । [2]
रसिकों के मुख से सुना है कि आपकी शरण में कोई भी महान् से महान् पतित भी चला जाता है तो उसे आप सदा के लिए अपना बना लेती हो । ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि यदि यह सच है तो तुम एक ‘कृपालु’ की ही बार इतनी निष्ठुर कैसे हो गयीं, आपको तो साधारण जीव भी भोली एवं सरल जानता है । [3]
हमरे कछु साधन - बल नाहीं, अति जड़ कुटिल लबार ।। [1]
भ्रमत उदर हित नाम ओट नित, ज्यों कूकर सब द्वार ।
समुझत जगत रसिक मोहिं साँचो, तुम उर जाननिहार ।। [2]
सुन्यों कान पतितन अपनावति, शरण गये सुकुमार ।
पुनि कृपालु क्यों भईं निठुर अब, एक ‘कृपालुहिं’ बार ।। [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा दैन्य – माधुरी (96)
हे निकुंजविहारिणी राधे ! हमारी भी खबर लीजिए । हमारे पास किसी प्रकार का कर्म, योग आदि साधन - बल नहीं है । मैं अत्यन्त हठी, दुष्ट एवं बातें बनाने वाला ही हूँ । [1]
पेट पालने के लिए आपके नाम की ओट लेकर दिन - रात कुत्ते की तरह सभी संसारी जीवों के द्वार पर घूमा करता हूँ । भोले - भाले संसार के जीव मुझे सचमुच ही रसिक महापुरुष समझते हैं, किन्तु हे किशोरी जी ! तुम तो हृदय की जानने वाली हो, तुमसे क्या छिपा है । [2]
रसिकों के मुख से सुना है कि आपकी शरण में कोई भी महान् से महान् पतित भी चला जाता है तो उसे आप सदा के लिए अपना बना लेती हो । ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि यदि यह सच है तो तुम एक ‘कृपालु’ की ही बार इतनी निष्ठुर कैसे हो गयीं, आपको तो साधारण जीव भी भोली एवं सरल जानता है । [3]

