जुगल रूप ऐसो चितैं - श्री नागरीदास जी (महाराज सावंत सिंह जी) की वाणी, मनोरथ मञ्जरी (32)

जुगल रूप ऐसो चितैं - श्री नागरीदास जी (महाराज सावंत सिंह जी) की वाणी, मनोरथ मञ्जरी (32)

जुगल रूप ऐसो चितैं, गिरिरह्वौ तन सुधि भूल।
वे नूपुर झनकाय कैं, जैहैं जमुना कूल॥
- श्री नागरीदास जी (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, मनोरथ मञ्जरी (32)

प्रेम से रोमांचित होकर, अपने तन की सुधि भूलकर, युगल-रूप का ऐसा चिंतन कीजिए जिसमें वे नूपुरों की झंकार करते हुए यमुना-किनारे विहार कर रहे हों।