पद रज तज किमि - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (219)

पद रज तज किमि - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (219)

(राग तोड़ी जौनपुरी / राग काफ़ी)
पद रज तज किमि आस करत हो, जोग जग्य तप साधा की। [1]
सुमिरत होय मुख आनन्द अति, जरन हरन दुःख बाधा की॥ [2]
ललित किशोरी शरण सदा रहु, सोभा सिन्धु अगाधा की। [3]
परम ब्रह्म गावत जाको जग, झारत पद रज राधा की॥ [4]
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी , विनय (219)

श्री राधा के चरणों की परम-पावन रज को छोड़कर योग, यज्ञ, तपस्या, साधना आदि से क्या आशा लगाए बैठे हो? [1]

जिनके मुखकमल के स्मरण मात्र से ही अत्यंत आनंद की अनुभूति होती है एवं जन्म-मरण के दुःख व बाधाएँ स्वतः ही नष्ट हो जाती हैं। [2]

उन नित्य-किशोरी श्री राधा की शरण ग्रहण करो, जो माधुर्य और शोभा की अथाह सागर हैं। [3]

जिन परम ब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति पूरी सृष्टि करती है, वे भी श्री राधारानी के चरणों की रज को झाड़ते हैं, अर्थात् उनके चरणों की सेवा में लीन रहते हैं। [4]