अन्तरीयगसुरत्नमण्डपे स्वीयकुण्डमनु - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (5.3)

अन्तरीयगसुरत्नमण्डपे स्वीयकुण्डमनु - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (5.3)

अन्तरीयगसुरत्नमण्डपे स्वीयकुण्डमनु वार्षभानवी।
श्यामलेन सहागानकौतुकं कुर्वती स्फुरतु में सखीवृता ।।

- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (5.3)

अपने निज कुण्ड के निकुट अन्तरंग सुन्दर रत्नमण्डप में सखिवृन्द के साथ श्रीवृषभानुनन्दिनी श्रीश्यामसुन्दर के सहित गान-कौतुक कर रही हैं-ऐसी छवि मेरे चित्त में स्फुरित हो।