प्रथम महातम प्रकृति - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (45)

प्रथम महातम प्रकृति - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (45)

प्रथम महातम प्रकृति, ज्ञान रवि तहाँ प्रकासै।
दूजै ब्रह्म प्रकास कोटि सूरज सम भासै ।।
तीजै पंकज- नाभि - रमा बैकुंठ निवासी ।
चौथे दसरथ सुवन राम गोपुर के वासी ।।
पाँचे ब्रज के गोप नंद आदिक सब गोपी।
छठवे सखी समाज करै लीला रस ओपी।।
भगवत सतयें आदरन करहिं केलि राधा रवन।
सर्वोपरि सर्वेस गुरु रसिकराइ मंगल भवन ।।

- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (45)

आनंद के सात परिवेश है। उनमें श्रीप्रिया प्रियतम की केलि चरम परिवेश में है। वही सातवाँ परिवेश रसिकराय श्रीस्वामीहरिदासी का मंगल भवन है, इस बात को स्पष्ट करते हुए भगवतरसिकजी कहते हैं:
1. आनंद का प्रथम परिवेश वह है जहाँ गहन अंधकारमयी प्रकृति में ज्ञान का सूर्य प्रकाशित होता है।
2. दूसरा परिवेश है ब्रह्म ज्ञान के प्रकाश का, जो करोडों सूर्यो के सदृश जगमगाता रहता है।
3. तीसरा परिवेश वह वैकुंण्ठ धम है, जहाँ भगवान् विष्णु और लक्ष्मीजी निवास करते हैं।
4. चौथे परिवेश साकेत धाम में दशरथ नंदन भगवान श्री रामचन्द्रजी महाराज विरामजान हैं।
5. पाँचवें परिवेश ( ब्रजधाम) में भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र के साथ समस्त नंद आदि गोप और ब्रजगोपियाँ विद्यमान हैं।
6. छठे परिवेश श्रीवृन्दावन में श्रीकृष्ण, सखी समाज के साथ रसमयी रासलीलाएँ रचाते रहते हैं ।
7. सातवाँ आवरण वह निकुंज महल है जहाँ श्रीप्रियालाल नित्य केलि निमग्न रहते हैं। यही सर्वोपरि सातवाँ आवरण सबके स्वामी और सबके गुरु रसिक चक्रचूडामणि स्वामी श्रीहरिदासजी महाराज का मंगल भवन हैं।