(राग गंधार)
आजु बन राजत जुगल किसोर ।
नंद नँदन वृषभानु नंदिनी उठे उनीदें भोर ।। [1]
डगमगात पग परत सिथिल गति परसत नख ससि छोर ।
दसन बसन खंडित मषि मंडित गंड तिलक कछु थोर ।। [2]
दुरत न कच करजनि के रोकें अरुन नैन अलि चोर ।
(जै श्री) हित हरिवंश सँभार न तन मन सुरत समुद्र झकोर ।।[3]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (33)
आज श्रीवृन्दावन में युगलकिशोर श्रीश्यामाश्याम शोभायमान हैं। श्रीनन्दनन्दन और श्रीवृषभानुनन्दिनी सम्पूर्ण रात्रि प्रेम विहार करने के बाद उनींदी अवस्था में प्रातःकाल उठे हैं। [1]
उनके चरण डगमगाते हुए पड़ रहे हैं और उनकी गति शिथिल हो रही है । (डगमगाने के कारण) चलते हुए दोनों एक दूसरे को वसनाञ्चलों का – पट छोरों का अपने अपने नख चन्द्र से स्पर्श करते ( -एवं आकर्षण करते हैं । )। (अब श्रीयुगल के अंगों में उदित सुरत-चिहों का वर्णन करते हुए कहते हैं) उनके अधर खण्डित हैं, कपोल काजल की रेखाओं से मण्डित हैं और श्रमजल के बार-बार पोंछने से उनके मस्तक पर तिलक कुछ ही शेष रह गया है। [2]
(प्रेम-रसासव पान से) अरुण नयन , जो चोर अलि – भ्रमर ही हैं केश राशि एवं उँगलियों के द्वारा छिपाये जाने पर भी नहीं छिपते -गोप्य रस पूर्ण रति विहार का प्रकाश किये ही दे रहे हैं । श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं कि सुरत समुद्र की झकझोर के कारण ( आज दोनों को अपने अपने ) तन एवं मन की भी संभाल नहीं रह गयी है , ( ऐसे रस मग्न हो रहे हैं ! )
[3]
आजु बन राजत जुगल किसोर ।
नंद नँदन वृषभानु नंदिनी उठे उनीदें भोर ।। [1]
डगमगात पग परत सिथिल गति परसत नख ससि छोर ।
दसन बसन खंडित मषि मंडित गंड तिलक कछु थोर ।। [2]
दुरत न कच करजनि के रोकें अरुन नैन अलि चोर ।
(जै श्री) हित हरिवंश सँभार न तन मन सुरत समुद्र झकोर ।।[3]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (33)
आज श्रीवृन्दावन में युगलकिशोर श्रीश्यामाश्याम शोभायमान हैं। श्रीनन्दनन्दन और श्रीवृषभानुनन्दिनी सम्पूर्ण रात्रि प्रेम विहार करने के बाद उनींदी अवस्था में प्रातःकाल उठे हैं। [1]
उनके चरण डगमगाते हुए पड़ रहे हैं और उनकी गति शिथिल हो रही है । (डगमगाने के कारण) चलते हुए दोनों एक दूसरे को वसनाञ्चलों का – पट छोरों का अपने अपने नख चन्द्र से स्पर्श करते ( -एवं आकर्षण करते हैं । )। (अब श्रीयुगल के अंगों में उदित सुरत-चिहों का वर्णन करते हुए कहते हैं) उनके अधर खण्डित हैं, कपोल काजल की रेखाओं से मण्डित हैं और श्रमजल के बार-बार पोंछने से उनके मस्तक पर तिलक कुछ ही शेष रह गया है। [2]
(प्रेम-रसासव पान से) अरुण नयन , जो चोर अलि – भ्रमर ही हैं केश राशि एवं उँगलियों के द्वारा छिपाये जाने पर भी नहीं छिपते -गोप्य रस पूर्ण रति विहार का प्रकाश किये ही दे रहे हैं । श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं कि सुरत समुद्र की झकझोर के कारण ( आज दोनों को अपने अपने ) तन एवं मन की भी संभाल नहीं रह गयी है , ( ऐसे रस मग्न हो रहे हैं ! )
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