बरसानौ गाम निज धाम - रसिक वाणी

बरसानौ गाम निज धाम - रसिक वाणी

(कवित्त)
बरसानौ गाम निज धाम श्री प्यारी जू कौ, 
ताके निज सेवक सो करत खवासी है। [1]
भूमि ही सौ काम नाम रटै श्री राधे जू कौ, 
मूरख बिमुख लोग जानत उदासी है॥ [2] 
भक्तन के दास आस राखै श्री किशोरी जी की,
भोरे से दीखै ये बड़े सुखरासी है। [3]
कुमरि लड़ेती जू की खेलन की ठौर रहै, 
औगुन अनेक भरे तौ हू बृजवासी है॥ [4]
- ब्रज के कवित्त

बरसाना गाँव हमारी श्री प्यारीजी, श्री राधा का निज धाम है। हम उनके निज जनों की सेवा करते हैं। [1]

हमें केवल इसी भूमि से काम है, और "राधे राधे" नाम ही दिन-रात जप करते हैं। इस उपासना को मूर्ख और विमुख जन उदासी का मार्ग समझते हैं। [2]

हम श्री राधा के भक्तों की प्रेमपूर्वक सेवा करते हैं और हमारी एक मात्र आशा श्री किशोरी जी से ही है। यूँ तो ब्रजवासी बड़े भोले से दिखते हैं, परंतु वास्तविकता में यह सब सुख की खान हैं। [3]

बरसाना धाम श्री राधा की विचित्र खेल की भूमि है। यद्यपि ऐसा लग सकता है बाहरी दृष्टि से कि ब्रजवासियों में अनेक दोष हैं, परंतु फिर भी वह ब्रजवासी हैं और श्री राधा रानी के कृपा पात्र जन हैं। [4]