जबते प्रीति श्याम सों - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (417)

जबते प्रीति श्याम सों - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (417)

(राग सारंग)
जबते प्रीति श्याम सों कीनी।
तादिन ते मेरे इन नैंननि ने नेकहु नींद न लीनी।। [1]
सदा रहत चित चाक चढ्यो सो और कछु न सुहाय। 
मन में रहे उपाय मिलन को इहै विचारत जाय ।। [2]
परमानंद पीर प्रेम की काहु सों नहीं कहिये। 
जैसे बिथा मूक बालक की अपने तन मन सहिये।। [3]
- श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (417)

जब से मैंने श्याम सुन्दर से प्रीति की है, उस दिन से अब तक एक क्षण को भी मेरे इन नैनों ने नींद नहीं ली। [1]

मेरा हृदय तो मानो चक्की में ही पीस दिया गया हो, और मुझे श्री कृष्ण के अतिरिक्त कुछ भी सुहाता नहीं है। मैं हर क्षण यह ही विचार करता हूँ कि ऐसा कौन सा उपाय है जिससे मेरा अपने प्रियतम श्याम सुन्दर से मिलन हो सके । [2]

श्री परमानन्द दास जी कहते हैं कि प्रेम विरह की यह पीर ऐसी है जैसे एक मूक बच्चा दर्द से गुजरता है स्वयं सहता भी रहता है परन्तु किसी से कह भी नहीं सकता और चुप्पी में ही रहता है, ठीक वैसे ही मेरी भी दशा है । [3]