यद्यपि राजत अवनि पर - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (74)

यद्यपि राजत अवनि पर - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (74)

यद्यपि राजत अवनि पर, सबते ऊँचौ आहि।
ताकी सम कहिये कहा, श्रीपति बंदत ताहि॥

- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (74)

धरा-धाम पर विराजमान होते हुए भी श्रीवृन्दावन सर्वोपरि है, जिसकी वंदना स्वयं लक्ष्मीपति करते हैं; उसके समान और कौन हो सकता है?