ना काहू सौं रूसनौ, ना काहू सौं रंग।
श्री ललितमोहिनी दास की, अद्भुत केलि अभंग॥
- श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी (27)
हमारा किसी से न तो कोई द्वेष है और न ही किसी के प्रेम के रंग में रंगे हैं। हम तो केवल श्री श्यामा-श्याम की उस अपार और दिव्य 'नित्य-केलि' के रंग में सराबोर होकर उसी परम रस का निरंतर आस्वादन कर रहे हैं।
श्री ललितमोहिनी दास की, अद्भुत केलि अभंग॥
- श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी (27)
हमारा किसी से न तो कोई द्वेष है और न ही किसी के प्रेम के रंग में रंगे हैं। हम तो केवल श्री श्यामा-श्याम की उस अपार और दिव्य 'नित्य-केलि' के रंग में सराबोर होकर उसी परम रस का निरंतर आस्वादन कर रहे हैं।

