(राग कल्याण)
यह कौन बात जु अबही और अबही और अबही औरै ।
देव नारि नाग नारि और नारि ते न होइँ और की औरै ॥ [1]
पाछै न सुनी अब हूँ आगैं हूँ न ह्वै है
यह गति अद्भुत रूप की और की औरै । [2]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी
या रस ही बस भयै यह भई और की औरै ॥ [3]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (54)
श्री हरिदासी सखी मनोहर शैय्या पर विराजित लाल लाड़िली से लाड़ लड़ा रही हैं। श्री कुंजबिहारी कहते हैं हे प्यारी जी, यह कैसा अद्भुत आपका रूप लावण्य है जो क्षण क्षण भिन्न भिन्न छटा बिखेर रहा है । बिहारी जी कह रहे हैं, ऐसी छवि यहीं पर है और कहीं नहीं, देव लोक, नाग लोक तक अन्य युवतियों, नारियों की रूप माधुरी यथावत् रहती हैं, परन्तु आपको छवि प्रति क्षण नित नवीन और ही और अद्भुत रूप धारण करती है। [1]
ऐसा अद्भुत रूप न तो पहले कहीं सुना है, न अभी और ना ही आगे कभी ऐसा और कहीं होगा प्यारी जी, जैसा अद्भुत रूप आपका है (जिस गति से आपका रूप सौंदर्य लावण्य इत्यादि बढ़ता है) । आपकी रूप माधुर्य की यह गति अद्भुत है। [2]
श्री स्वामी हरिदास जी महाराज [ललिता सखी] कहते हैं कि श्री कुंज बिहारी नित्य ही इस अद्भुत रस के आधीन रहते हैं जो नित्य प्रति बढ़ता है, अर्थात् प्यारी जू का रूप माधुर्य जो हर क्षण नव नवायमान एवं अलग प्रतीत होता है, इस रस के वश श्री श्याम सुंदर रहते हैं । [3]
यह कौन बात जु अबही और अबही और अबही औरै ।
देव नारि नाग नारि और नारि ते न होइँ और की औरै ॥ [1]
पाछै न सुनी अब हूँ आगैं हूँ न ह्वै है
यह गति अद्भुत रूप की और की औरै । [2]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी
या रस ही बस भयै यह भई और की औरै ॥ [3]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (54)
श्री हरिदासी सखी मनोहर शैय्या पर विराजित लाल लाड़िली से लाड़ लड़ा रही हैं। श्री कुंजबिहारी कहते हैं हे प्यारी जी, यह कैसा अद्भुत आपका रूप लावण्य है जो क्षण क्षण भिन्न भिन्न छटा बिखेर रहा है । बिहारी जी कह रहे हैं, ऐसी छवि यहीं पर है और कहीं नहीं, देव लोक, नाग लोक तक अन्य युवतियों, नारियों की रूप माधुरी यथावत् रहती हैं, परन्तु आपको छवि प्रति क्षण नित नवीन और ही और अद्भुत रूप धारण करती है। [1]
ऐसा अद्भुत रूप न तो पहले कहीं सुना है, न अभी और ना ही आगे कभी ऐसा और कहीं होगा प्यारी जी, जैसा अद्भुत रूप आपका है (जिस गति से आपका रूप सौंदर्य लावण्य इत्यादि बढ़ता है) । आपकी रूप माधुर्य की यह गति अद्भुत है। [2]
श्री स्वामी हरिदास जी महाराज [ललिता सखी] कहते हैं कि श्री कुंज बिहारी नित्य ही इस अद्भुत रस के आधीन रहते हैं जो नित्य प्रति बढ़ता है, अर्थात् प्यारी जू का रूप माधुर्य जो हर क्षण नव नवायमान एवं अलग प्रतीत होता है, इस रस के वश श्री श्याम सुंदर रहते हैं । [3]

