बार-बार तो बनत नहिं - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, रहस्य लता (60)

बार-बार तो बनत नहिं - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, रहस्य लता (60)

(कुंडलियाँ)
बार-बार तो बनत नहिं , यह संजोग अनूप ।
मानुष तन वृन्दाविपिन , रसिकनि सँग विवि रूप ।। [1]
रसिकनि सँग विवि रूप:, भजन सर्वोपरि आहि  ।
मन दै 'ध्रुव' यह रंग, लेहु पल-पल अवगाही ।। [2]
जो छिन जात सो फिरत नहीं, करहु उपाइ अपार ।
सकल सयानप छाँड़ि भजि, दुर्लभ है यह बार ।। [3]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, रहस्य लता (60)

मानव-तन की प्राप्ति, श्री वृन्दावन का निवास, रसिक भक्तो का संग अवं श्री श्यामा श्याम युगल रूप की इष्टता का यह अनुपम संयोग जीवन में अथवा अन्य जीवनो में बारम्बार सहज रूप से नहीं बनता । [1] 

भजन की उज्वल रसमयी सर्वोपरि रीति भी यही है, अतएव मन देकर इस आनद रंग का प्रतिपल अवगाहन करना चाहिए । [2]

जीवन का जो क्षण व्यतीत हो जाता है, अनेक उपाय करने पर भी वो क्षण लौटकर पुनः हस्तगत नहीं होता । श्री हित ध्रुवदास जी कहते है कि अपनी सारी चतुराई छोड़कर श्रीलाड़िली-लाल का भजन ही करना चाहिए, क्योंकि यह उपरिवर्णित संयोग प्राप्ति रूपी अवसर दुर्लभ ही नहीं, दुर्लभतर है । [3]