सघन कुंज छाया सुखद, सीतल सुरभि समीर।
मनु ह्वै जात अजौं वहै, उहि जमुना के तीर॥
- श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई (5)
जहाँ की कुंजें घनी हैं, छाया सुख देने वाली है और पवन शीतल व सुगंधित है—उस वृन्दावन में यमुना के तट पर जाते ही आज भी मन उसी प्रकार श्री राधा-कृष्ण के प्रेम में मग्न हो जाता है।
मनु ह्वै जात अजौं वहै, उहि जमुना के तीर॥
- श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई (5)
जहाँ की कुंजें घनी हैं, छाया सुख देने वाली है और पवन शीतल व सुगंधित है—उस वृन्दावन में यमुना के तट पर जाते ही आज भी मन उसी प्रकार श्री राधा-कृष्ण के प्रेम में मग्न हो जाता है।

