जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि - श्रीमद भागवतम् (10.31.1)

जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि - श्रीमद भागवतम् (10.31.1)

जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि ।
दयित दृश्यतां दिक्षु तावका स्त्वयि धृतासवस्त्वां विचिन्वते ॥

- श्रीमद भागवतम् (10.31.1)

हे प्यारे ! तुम्हारे जन्म के कारण वैकुण्ठ आदि लोकों से भी ब्रज की महिमा बढ गयी है। तभी तो सौन्दर्य और मृदुलता की देवी लक्ष्मीजी अपना निवास स्थान वैकुण्ठ छोड़कर यहाँ नित्य निरंतर निवास करने लगी है , इसकी सेवा करने लगी है। परन्तु हे प्रियतम ! केवल तुम्हारे ही कारण हमने अपने प्राणों को सम्भाल कर इस देह में रखा हुआ है , हम तुम्हें हर जगह ढूंढ़ रही हैं, कृपा करके हमें अपना दर्शन दीजिए ।