(राग मल्हार)
कदम तरे ठाढ़े दोऊ बतरावें ।
परत फुहार पवन झकझोरत, अब कित भाजिके जावें ।। [1]
भवन दूरि बन ठौर न दीखत, जहाँ निज बसन दुरावें ।
नारायण कछु दूरि जायके, फेरि बगदि वहिं आवें ।। [2]
- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (6)
कदम वृक्ष के नीचे दोनों [राधा कृष्ण] बातें कर रहे हैं । अचानक वर्षा होने लगी, झकझोर से हवा भी चलने लगी, अब यह दोनों सोचने लगे कि अब कहाँ भाग कर जाएँगे? [1]
इनका भवन तो दूरी पर है, और कोई ठौर भी पास में नहीं दिखता जहां यह अपने वस्त्रों को यह छिपा सकें । श्री नारायण स्वामी जी इस लीला को देख कर कहते हैं कि इन्होंने मन बना लिया यहाँ से चलने का, कुछ दूर चले, परंतु वर्षा के कारण पुनः वह वहीं आ गए जिस कदम्ब वृक्ष से गए थे । [2]
कदम तरे ठाढ़े दोऊ बतरावें ।
परत फुहार पवन झकझोरत, अब कित भाजिके जावें ।। [1]
भवन दूरि बन ठौर न दीखत, जहाँ निज बसन दुरावें ।
नारायण कछु दूरि जायके, फेरि बगदि वहिं आवें ।। [2]
- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (6)
कदम वृक्ष के नीचे दोनों [राधा कृष्ण] बातें कर रहे हैं । अचानक वर्षा होने लगी, झकझोर से हवा भी चलने लगी, अब यह दोनों सोचने लगे कि अब कहाँ भाग कर जाएँगे? [1]
इनका भवन तो दूरी पर है, और कोई ठौर भी पास में नहीं दिखता जहां यह अपने वस्त्रों को यह छिपा सकें । श्री नारायण स्वामी जी इस लीला को देख कर कहते हैं कि इन्होंने मन बना लिया यहाँ से चलने का, कुछ दूर चले, परंतु वर्षा के कारण पुनः वह वहीं आ गए जिस कदम्ब वृक्ष से गए थे । [2]

