कुँवरि राधिका तुम सकल सौभाग्य सींवा - श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (159)

कुँवरि राधिका तुम सकल सौभाग्य सींवा - श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (159)

(राग रामकली एवं देवगंधार)
कुँवरि राधिका तुम सकल सौभाग्य सींवा, या वदन पर कोटि शत चंद वारि ड़ारौ।
खंजन कुरंग श्ता कोटि नैनन ऊपर, करत जिय में विचारौं ।। [1]
कदली शत कोटि जंघन ऊपर, सिंघ शत कोटि कटि पर न्यौछावर करि उतारौं।।
मत्त गज शत कोटि चाल पर, कुँभ शत कोटि इन कुचन पर वारि डारौं।। [2]
कीट शत कोटि नासिका ऊपर, कूँद शत कोटि दशनन ऊपर काहे न वारौं।
प्कव कंदूर बन्धूक शत कोटि अधरन ऊपर, वारि रुचि गर्व टारौं ।। [3]
नाग शत कोटि बेनी ऊपर, कपोल शत कोटि ग्रीवा दूरी सारों।
कमल शत कोटि कर जुगल पर, वारने नाहिन कोऊ उमां जुधारौं ।। [4]
दास कुम्भन स्वामिनी सुनख सिख, अद्भुत सुठानि कहालौ संभारो।
लाल गिरधर कहत मोहि तोलों सुख, जोलों यह रूप छिनु छिनु निहारौं ।। [5]

- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (159)

श्री कुम्भनदास कहते हैं "हे कुँवरि राधिका जू, आप समस्त सौभाग्य की सीमा हो, आपके इस स्वरुप पर मैं कोटि कोटि चंद्रमाओं को न्योछावर कर दूँ। मेरे मन में यह विचार भी आ रहा है की आपके नयन कमलों पर कोटि कोटि खंजन पक्षी तथा मृगों को न्योछावर कर दूँ, जिनके नेत्र विश्व में सबसे सुन्दर माने गए हैं।" [1]

हे श्री श्यामा जू, आपके ऊरु प्रदेश पर करोड़ों कोटि कदली वृक्षों तथा आपके कटी प्रदेश पर कोटि कोटि सिंह न्योछावर कर दूँ। आपकी चाल पर कोटि कोटि मतवाले हाथियों तथा आपके ह्रदय प्रदेश पर कोटि कोटि कलशों को न्योछावर कर दूँ। [2]

हे श्री प्यारी जू, आपके नासिका की छवि पर कोटि कोटि शुक तथा आपके सुन्दर दन्त पंक्तियों पर कोटि कोटि कुंद पुष्पों को क्यों ना न्योछावर कर दूँ। आपके अधरों की छवि पर कोटि कोटि पके हुए लाल बेर तथा कोटि कोटि बन्धूक पुष्पों को न्योछावर कर दूँ एवं इनके गर्व का खण्डन कर दूँ। [3]

हे श्री राधा जू, आपकी वेणी की छवि पर कोटि कोटि नाग तथा आपके सुन्दर कपोलों पर कोटि कोटि सारिकाओं को न्योछावर कर दूँ। आपके हस्त कमलों पर कोटि कोटि कमल पुष्प तथा कोटि कोटि बन्धूक पुष्पों को न्योछावर कर दूँ जबकि ये सब भी आपके समक्ष उपमा के योग्य नहीं। [4]

श्री कुम्भनदास कहते हैं "हे श्री स्वामिनी जू, आपके नख सिख की छवि ऐसी अद्भुत है की मैं कहते कहते कहाँ तक वाणी को सम्भालूँ। यहाँ तक की गिरिधर श्री कृष्ण भी कहते हैं की मुझे सुख तभी तक है जब तक आपको हर क्षण निहारता रहूँ।" [5]