लीनों बृन्दावन बसि लाह्यो - श्री अलबेली अलि

लीनों बृन्दावन बसि लाह्यो - श्री अलबेली अलि

लीनों बृन्दावन बसि लाह्यो ।
सेवा-टहल महल की निसि-दिन, यह जिय नेम निबाह्यो।। [1] 
अद्भुत प्रेमबिहार चारु रस, रसिकनि बिनु किनु चाह्यो। 
‘अलबेली’ अलि सफल कियो सब, जिन यह रस अवगाह्यो।। [2]
- श्री अलबेली अलि 

हे मन, वृंदावन में वास कर निशिदिन महल टहल [सेवा] का अनन्य नेम [व्रत] हृदय से पालन कर।  [1]

प्रेम विहार का यह रस अद्भुत एवं विलक्षण है, अत: रसिकों से नेह बढ़ा जिनकी कृपा से ही इस रस में प्रवेश होता है । श्री अलबेली अलि कहते हैं कि उनकी दृष्टि में केवल वह लोग ही भाग्यशाली हैं [उनका ही जीवन सफल है] जिन्होंने इस रस का परिचय प्राप्त किया है । [2]