श्रीवृन्दा विपुन अगाध रस, लहै न कोऊ थाहि।
ललित किसोरी कृपा तें, मन-वच-क्रम अवगाहि॥
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत की साखी (169)
श्रीवृन्दावन का यह केलि-विलास-रस अथाह है— इसकी गहराई को कोई नाप नहीं सकता। जिस पर भी श्री ललितकिशोरी जी (श्री राधा) की कृपा हो जाती है, वही इस रस की अलौकिक माधुरी का अनुभव कर पाता है।

