युगलवर, रसिकन को सिरमोर।
ठकुरानी राधा महरानी, ठाकुर नंदकिशोर।। [1]
गौर वरनि वृषभानुनंदिनी, नील वरन चितचोर।
दोउ कर नित्य विहार निकुंजनि, ह्वै रस रास विभोर।। [2]
दोउ मुख चंद्र चकोर दोउ दृग, भेंटत प्रेम अँकोर।
कहत ‘कृपालु’ ओर दोउन लखि, हेरहु हमरिहुँ ओर।। [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, युगल माधुरी (16)
श्यामा श्याम रसिकों में सर्वश्रेष्ठ हैं। हमारी स्वामिनी श्री किशोरी जी हैं एवं हमारे स्वामी श्री श्यामसुन्दर हैं। [1]
गौरवर्ण की वृषभानुनन्दिनी हैं एवं नील वर्ण के नन्दकिशोर हैं। दोनों ही रास रस में विभोर होकर निकुंजों में नित्य विहार करते हैं। [2]
दोनों के मुखारविन्द एक दूसरे के लिए चन्द्रमा के समान हैं एवं दोनों के नेत्र एक दूसरे के लिए चकोर के समान हैं। दोनों ही एक दूसरे को प्रेम से भेंटते हैं। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि हम दोनों ही की ओर देखते हुए इस आशा में बैठे हैं कि वे कभी हमारी ओर भी निहार दें। [3]

