प्यारी जू सुंदर वदन - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (180)

प्यारी जू सुंदर वदन - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (180)

(राग सारंग)
प्यारी जू सुंदर वदन तिहारौ।
निरखि निरखि प्रीतम सचुपावत निमुषहु होत न न्यारौ।। [1] 
मंद हासि परिहासि परस्पर नव नव नेह निहारौ। 
श्रीबिहारीबिहारनिदासि रहसि रस वृन्दाविपिन विहारौ ।। [2]
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (180)

हे प्यारी जू [श्री राधा] आपका रूप सौंदर्य अत्यंत सुंदर एवं मनोरम है। इस रूप को निहार निहार कर प्रीतम [श्री कृष्ण] अत्यंत सुख का अनुभव करते हैं, एवं एक क्षण के लिए भी नहीं अपनी आखों से नहीं हटाते ।  [1]

सखियां नित्य ही मंद मंद हास परिहास [युगल के] के नव नवायमान नेह को नित्य ही निहारती रहती हैं। श्री बिहारिन दास जी कहते हैं कि श्री वृन्दावन का विहार रस अत्यंत अद्भुत एवं एक ऐसा रहस्य रस है जो सबकी बुद्धि से परे है । [2]