राधा वल्लभ मधुर रस, जाकैं हृदय नहिं व्यास।
मानुष देही रतनसी, भली विगारी तास॥
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (71)
जिसके हृदय में श्री राधा-कृष्ण का मधुर रस व्याप्त नहीं है, उसने रत्न के समान इस अमूल्य मानव-देह को पाकर भी अपना जीवन बिगाड़ लिया है।
मानुष देही रतनसी, भली विगारी तास॥
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (71)
जिसके हृदय में श्री राधा-कृष्ण का मधुर रस व्याप्त नहीं है, उसने रत्न के समान इस अमूल्य मानव-देह को पाकर भी अपना जीवन बिगाड़ लिया है।

