आशास्य-दास्यं-वृषभानुजाया- स्तीरे समध्यास्य च भानुजाया:।
कदा नु वृन्दावन-कुञ्ज-वीथी- ष्वहं नु राधे ह्यतिथिर्भवेयम् ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (197)
भानु-नन्दिनी श्रीयमुना के तट में अविचल भाव से स्थिर रहकर एवं वृषभानु-नन्दिनी के दास्य-भाव को मन में धारण करके मैं वृन्दावन की कुञ्ज-वीथियों में क्या कभी अतिथि (अभ्यागत) होऊँगी? (अतिथि किंवा अभ्यागत बनने का लाभ यह है कि श्रीवृन्दावन की कुंज गलियों में विचरण करने वाले भिक्षुओं को ही ब्रह्मादिकों को भी दुर्लभ, श्रीराधादास्य भिक्षा में मिलता है।)
कदा नु वृन्दावन-कुञ्ज-वीथी- ष्वहं नु राधे ह्यतिथिर्भवेयम् ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (197)
भानु-नन्दिनी श्रीयमुना के तट में अविचल भाव से स्थिर रहकर एवं वृषभानु-नन्दिनी के दास्य-भाव को मन में धारण करके मैं वृन्दावन की कुञ्ज-वीथियों में क्या कभी अतिथि (अभ्यागत) होऊँगी? (अतिथि किंवा अभ्यागत बनने का लाभ यह है कि श्रीवृन्दावन की कुंज गलियों में विचरण करने वाले भिक्षुओं को ही ब्रह्मादिकों को भी दुर्लभ, श्रीराधादास्य भिक्षा में मिलता है।)

