मात तात सुत दार देह में - श्री हित वृंदावन दास जी

मात तात सुत दार देह में - श्री हित वृंदावन दास जी

मात तात सुत दार देह में, मति अरुझै मति मन्दा।
श्रीहित किशोर कौ ह्वै चकोर तू, लखि 'वृन्दावनचन्दा'॥

- श्री हित वृंदावन दास जी

हे मंदबुद्धि जीव! माता, पिता, पुत्र, घर और देह आदि की आसक्ति में फँसकर इस मानव-देह रूपी अमूल्य वस्तु को क्यों नष्ट कर रहा है? श्री हित वृन्दावनदास जी कहते हैं कि प्रेम-स्वरूप इस वृन्दावन के चंद्र श्री युगल-किशोर को अब चकोर की भाँति तनिक निहार।