राधा माधौ बिहरै बन मैं -  श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (188)

राधा माधौ बिहरै बन मैं - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (188)

(राग विहाग)
राधा माधौ बिहरै बन मैं ।
हरी भरी कुंजनि जमुनातट फूले फूले मन मैं ।। [1]
मदन-केलि-सुख-पगे जगमगे जगी तरुनई तन मैं ।
अरस-परस तन बन परसत आनँदघन भीजे पन मैं ।। [2]

-  श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (188)

श्री आनंदघन कह रहे हैं "श्री वृन्दावन में यमुना तट पर हरी भरी कुंजों में श्री राधा माधव मन में फुले फुले विचरण करते हैं।"

केली प्रेम क्रीड़ा सुख में रत श्री राधा माधव के श्री अंग नित्य तरुण है, कभी एक दूसरे को देखते हैं, कभी स्पर्श करते हैं, तथा स्पर्श करते ही प्रेम में भींज रहे हैं।