(राग मलहार)
दामिनि कहत मेघ सौं हमारी उपमा दैहिं
ते झूठे एई मेघ एई बिजुरी साँची ।
जिन जिन हमारी उपमा दीनी तिन तिन की मति काँची ॥ [1]
ऐसी कहूँ सुनी जु बूँद तें कन न्यारौ
ता पटतर क्यौं दीजै समुद्र राँची ।
श्रीहरिदास के स्वामी कुंजबिहारी की
अटल अटल प्रीति माँची ॥ [2]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (95)
दामिनी मेघ से कहती हैं कि श्यामा श्याम की जो जन हमारे से उपमा [तुलना] देते हैं वह उपमा देना ही झूठ है । परंतु श्री लाल जी तो साँचे मेघ एवं श्री स्वामिनी जी साँची दामिनी हैं । उन लोगों [कवियों] की मति [बुद्धि] थोड़ी कम [कच्ची] रही होगी जो हम दोनों से तुलना कर रहे हैं [क्यूँकि हम मेघ एवं दामिनी तो अलग अलग भी बरस ग़रज़ पड़ते हैं] । [1]
ये [प्रिया प्रियतम] सच्चे हैं -मेघ लाल जी बिजली प्रिया जी का नित्य संयोग ही है। परंतु हम दोनों झूठे हैं, कभी मेघ दामिनी बिना ही बरस जाते हैं तो कभी दामिनी बिजली मेघ बिना ही चमक उठती है। अत: हम झूठे हैं। हम मेघ दामिनी बूंद की कण हैं। बूंद ऊपर से गिरती है, हम तो मात्र उसकी कण हैं। प्रिया प्रियतम प्रेम सागर हैं।
अत: यह तुलना उपमा सब झूठी है, श्री हरिदासी जी के स्वामी श्यामा कुंजविहारी की प्रीति अटल है । इसके आगे और कुछ नहीं। इन दोनों का प्रेम अविचल, एक रस नित्य है । [2]

