(राग विलावल)
देखोरी माई हरि नंगम नंगा।
जलसुत भूषण अंग विराजत बसन हीन छबि उठत तरंगा।। [1]
अंग अंग प्रति अमित माधुरी निरख लज्जित रविकोटि अनंगा।।
किलकत हँस दधि मुख लपटावत सूर हसत व्रजयुवतिन संगा।।[2]
- श्री सूरदास
हे सखी, देखो! आज श्रीकृष्ण नग्न हैं! उन्होंने केवल मोतियों के आभूषण ही अंग में पहने हैं एवं वस्त्र नहीं पहने हैं । सौंदर्य की लहरें उसके नग्न रूप से उत्पन्न होती हैं। [1]
श्री कृष्ण के अंगों से अतुलनीय माधुरी उत्पन्न हो रही है जिसे देखकर सूर्य एवं लाखों कामदेव लज्जित हो रहे हैं । उनके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान और दूध की बूंदें हैं; - सूरदास के भगवान गोपियों के साथ हंसी-ठिठोली कर रहे हैं। [2]

