मेरी अलक लडी अलबेली - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (10.4)

मेरी अलक लडी अलबेली - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (10.4)

(राग मलहार)
मेरी अलक लडी अलबेली।
झूलति रति बिपरीत हिंडोरै, नाहु अंस भुज मेली ।। 
मचकत जोबन जोर परस्पर, परिरंभन पग पेली।
गावत राग मलार मनोहर, भगवत रसिक सहेली ।। 
- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (10.4)

श्री भगवतरसिकजी कहते हैं कि मेरी अलबेली (बॉकी शोभामयी) अलक लडी (परम दुलारी) श्रीश्यामा प्यारी प्रियतम के गले में बाँहें डालकर विपरीत रति अर्थात्‌ परत्पर प्रेम के हिंडोले पर मलार राग गा रही हैं इधर ये परिरंभण परायण किशोरी श्याम (उस राग के उन्माद से भरकर) आनंदोल्लास के हिंडोले पर नव यौवन के जोर से मचकते हुए (लम्बे-लम्बे) पेंग बढाते चले जा रहे हैं।