प्रिया मुख निरखत नवल - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (43)

प्रिया मुख निरखत नवल - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (43)

(राग केदारौ)
प्रिया मुख निरखत नवल किसोर ।
मनहुँ सहज राकेस अमी प्रति, चितवत चकित चकोर ।। [1]
छिन - छिन नई - नई छबि उपजत, पल-पल में रूचि और ।
'हित ध्रुव' बसौ कुँवर उर ऐसै , परम रसिक सिरमौर ।। [2]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (43)

श्री प्रिया जी के मुख-मंडल का दर्शन करते नवल-किशोर प्रियतम ऐसे दिखते है, मानों राका-पति चन्द्रमा में निवसित अमृत को प्राप्त करने की लालसा से चकित हुआ चकोर अपने प्रिय चन्द्रमा को सहज एकटक निहारता रहता है । [1] 

और इधर प्रिया के श्रीमुख की विशेषता है कि उसमे प्रतिक्षण नूतन-नूतन छवियों का उदभव होता रहता है ततः प्रतिपल रोचकता भी बढ़ती रहती है । श्री हित ध्रुवदास जी कहते है कि मेरी यही कामना है कि ऐसे परम रसिक शिरोमणि युगल-किशोर प्रियतम साद-सर्वदा मेरे हृदय में बसे रहे । [2]