(सवैया)
संपति सौं सकुचाई कुबेरहि, रूप सौं दीनी चिनौति अनंगहि। [1]
संपति सौं सकुचाई कुबेरहि, रूप सौं दीनी चिनौति अनंगहि। [1]
भोग कै कै ललचाई पुरन्दर, जोग कै गंगलई धर मंगहि॥ [2]
ऐसे भए तौ कहा ‘रसखानि’, रसै रसना जौ जु मुक्ति तरंगहि। [3]
ऐसे भए तौ कहा ‘रसखानि’, रसै रसना जौ जु मुक्ति तरंगहि। [3]
दै चित ताके न रंग रच्यौ, जु रह्यौ रचि राधिका रानी के रंगहि॥ [4]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
यदि आपके पास इतनी अपार संपदा हो कि स्वयं धनाध्यक्ष कुबेर भी देखकर चकित रह जाएँ, और आपका रूप इतना अनुपम हो कि कामदेव भी लज्जा से सिर झुका लें। [1]
यदि आपका जीवन भोग-विलास से परिपूर्ण हो कि इंद्र भी ईर्ष्या करें, और आपकी गहन साधना देखकर स्वयं शंकर जी, जिनके जटाओं में गंगा विराजती हैं, आपके ध्यान का आदर्श मान लें। [2]
यदि आपकी वाणी इतनी मधुर हो कि उसमें सरस्वती का निवास प्रतीत हो और उसे सुनकर मुक्ति की तरंगें उमड़ पड़ें। [3]
फिर भी, रसखान कहते हैं—यह सब व्यर्थ है यदि आपने उनसे प्रेम नहीं किया, जिनका हृदय पूर्णतः श्री वृषभानु-किशोरी (श्री राधा) के प्रेम में निमग्न है। [4]
यदि आपका जीवन भोग-विलास से परिपूर्ण हो कि इंद्र भी ईर्ष्या करें, और आपकी गहन साधना देखकर स्वयं शंकर जी, जिनके जटाओं में गंगा विराजती हैं, आपके ध्यान का आदर्श मान लें। [2]
यदि आपकी वाणी इतनी मधुर हो कि उसमें सरस्वती का निवास प्रतीत हो और उसे सुनकर मुक्ति की तरंगें उमड़ पड़ें। [3]
फिर भी, रसखान कहते हैं—यह सब व्यर्थ है यदि आपने उनसे प्रेम नहीं किया, जिनका हृदय पूर्णतः श्री वृषभानु-किशोरी (श्री राधा) के प्रेम में निमग्न है। [4]

