कठिन पीर है प्रेम की - श्री हित भोरी सखी, प्रेम की पीर (185.9)

कठिन पीर है प्रेम की - श्री हित भोरी सखी, प्रेम की पीर (185.9)

कठिन पीर है प्रेम की, विरले जानैं ताहि। 
जे जानैं ते कहैं नहिं, रहैं सराहि-सराहि॥
- श्री हित भोरी सखी, प्रेम की पीर (185.9)

प्रेम की इस विरह-वेदना का मर्म समझना अत्यंत दुष्कर है, जिसे संसार का कोई विरला अनुरागी ही अनुभव कर पाता है। जो सौभाग्यशाली इस दिव्य पीड़ा को प्राप्त कर लेते हैं, वे इसे परम गोपनीय रखते हैं और वाणी से कभी प्रकट नहीं करते। वे केवल अपने अंतःकरण में ही इस पीड़ा की निरंतर सराहना करते रहते हैं।